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Showing posts from December 2, 2017
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डीएनए टेस्ट से पता चला, क्या है हिममानव के अस्तित्व का सच?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES तिब्बत और नेपाल की लोकप्रिय काल्पनिक कथाओं के मुताबिक़ एशिया के सुदूर पर्वतीय इलाकों में दैत्याकार बंदर जैसे जीव रहते हैं, जिन्हें येती या हिममानव कहा जाता है. सदियों से येती को देखे जाने की बातें की जा रही हैं. अब उसके फिंगरप्रिंट्स का पता चला है और साथ ही उसके शरीर के कुछ हिस्से मिलने का भी दावा किया गया है. अमरीकी जीवविज्ञानी शॉर्लट लिंडक्विस्ट के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने दावा किया है कि उन्होंने येती और उसके अंत से जुड़े रहस्यों को ढूंढ निकाला है. वो कहते हैं कि ये नतीजे निश्चय ही उससे जुड़ी काल्पनिक कथाओं को मानने वालों को निराश करेगी. 5300 साल पुरानी मर्डर मिस्ट्री की पुलिस जाँच सबसे पुराना जूता मिला इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES जांच में क्या पाया गया? लिंडक्विस्ट न्यूयॉर्क में बफेलो स्कूल ऑफ़ साइंस में प्रोफ़ेसर और सिंगापुर में नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं और उन्होंने येती के अवशेषों का डीएनए टेस्ट के ज़रिए विश्लेषण किया है. इन अवशेषों के नमूनों में हाथ, दांत, …
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सर्दियों में बंद कमरे में सोना जानलेवा हो सकता हैइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES सारा काम निपटाकर जब वो कैटरिंग वैन में सोने गए तो अपने साथ तंदूर भी लेते गए. वैन का दरवाज़ा शायद यही सोचकर बंद किया होगा कि अंदर गर्माहट बनी रहे और वो चैन से सो सकें लेकिन... पुलिस के अनुसार, अगली सुबह जब वैन का दरवाज़ा खोला गया तो दम घुटने से 6 लोगों की मौत हो चुकी थी. दिल्ली के कैंट इलाक़े की इस दुर्घटना जैसे कई मामले पहले भी आ चुके हैं. सर्दियों में ज़्यादातर घरों, दुकानों में गर्माहट के लिए ब्लोअर, हीटर या कोयले का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन क्या ये सुरक्षित तरीके हैं? क्या कहते हैं डॉक्टर ? आईएमए के डॉक्टर के के अग्रवाल का कहना है कि सबसे ज़रूरी है वेंटिलेशन. जहां वेटिंलेशन नहीं है, वहां ख़तरा है. अगर आप गर्माहट के लिए कोयला जला रहे हैं या फिर लकड़ी, तो इससे निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस दम घोंट सकती है. ख़ासतौर पर तब जब वेंटिलेशन का कोई प्रबंध नहीं है. इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES यहां तक कि अगर आप किसी कार में भी सिर्फ़ इंजन चलाकर बैठ जाएं तो भी दम घुट सकता है. डॉक्टर अग्रवाल के अनुसार, ये बात मायने नही…

गांजा पिने के इतने बड़े फायदे O my god, i don't believe

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Image captionगांजा पीने में इन पत्तियों का इस्तेमाल होता है एक शोध के मुताबिक गांजा पीने से उन मरीज़ों को पुराने पड़ चुके दर्द से काफ़ी राहत मिल सकती है जिनकी धमनियाँ क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं. इस शोध में 23 लोगों पर किए परीक्षणों में नींद और बेचैनी के मामलों में भी गांजा के इस्तेमाल से सुधार नज़र आया. कनेडियन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल में शोधकर्त्ताओं ने लिखा है कि गांजा पीने के लाभ पर अभी और शोध किए जाने की आवश्यकता है. ब्रिटेन के विशेषज्ञों का कहना है कि गांजा के इस्तेमाल से दर्द में मामूली लेकिन महत्त्वपूर्ण राहत दिखी है और अभी इस क्षेत्र में और शोध किए जाने की ज़रूरत है. क़रीब एक से दो प्रतिशत लोगों को धमनियों की समस्या की वजह से दर्द रहता है जो समय के साथ पुराना हो जाने से और कष्टदायी हो जाता है. ऐसे दर्द के लिए असरदायक दवा की कमी है. इस तरह के दर्द से प्रभावित कुछ मरीज़ों का कहना है कि उनके रोग के जो लक्षण हैं, उसमें गांजा लाभकारी सिद्ध हुआ है. शोधकर्त्ता इसकी जाँच कर रहे हैं कि गांजा की बजाए गांजा के रासायनिक तत्त्व वाली गोली भी उतनी ही कारगर होगी या नहीं. युनिवर्सिटी कॉलेज आफ़ लंदन…

सिक्स्थ सेंस क्या होती है और इसे कैसे करें सक्रिय

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सिक्स्थ सेंस क्या होती है और इसे कैसे करें सक्रिय560 सिक्स्थ सेंस यानी छठी इंद्री के बारे में आपने बहुत जगह पढ़ा और सुना होगा। देखा जाये तो हमारे शरीर में 5 इन्द्रियां होती हैं जो हैं नेत्र, नाक, जीभ, कान और त्वचा लेकिन इनके अलावा एक और इंद्री होती है जो दिखाई नहीं देती बल्कि सिर्फ उसे महसूस किया जा सकता है और इसे ही कहते हैं सिक्स्थ सेंस यानी छठी इंद्री। आपने भी कई बार महसूस किया होगा की भविष्य में होने वाली घटना का आपको पहले ही आभास हो गया था। दरअसल ये हमारी छठी इंद्री का ही कमाल है जो हमें भविष्य में होने वाली कई घटनाओं का पहले से आभास हो जाता है। कई बार तो ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जब मरने वाले व्यक्ति ने पहले ही अपनी मौत के बारे में बता दिया। आइये आज आपको बताते हैं ये सिक्स्थ सेंस यानी छठी इंद्री क्या होती है और इसे कैसे जागृत किया जा सकता है। क्या होता है छठी इंद्री के जागृत हो जाने पर – अगर किसी व्यक्ति की छठी इंद्री जागृत हो जाये तो उसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का किसी ना किसी संकेत के रूप में पहले से पता चल जाता है। छठी इंद्री जागृत हो जाने पर हम दूसरे व्यक्तियों के मन के …

Even after 37 years, Voyager 1’s thrusters work perfectly fine

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Even after 37 years, Voyager 1’s thrusters work perfectly fine
NASA’s JPL are using the TCM thrusters to adjust the directions of the antenna in interstellar space.  NASA suggests that Voyager 1 should keep on running for another 2-3 years before it runs out of fuel in the interstellar space. The Voyager 1 has been an important spacecraft for NASA and the world since it left the Earth in 1977. The spacecraft has helped eager eyes look at different worlds of the solar system and even has pushed the human race into interstellar space. However, as with all spacecraft, Voyager 1 needs to correct its course while being adrift in space and NASA has discovered a new way to keep its antenna pointing the right direction. The Voyager 1’s propulsion system has two kinds of thrusters to help it steer through space — Altitude Control Thrusters (ACT) and Trajectory Correction Manoeuvre thrusters (TCM). The ACT is responsible for keeping the antenna aligned towards Earth so as to let Voyager 1 ‘talk’ …